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NOC में ‘प्रतिनियुक्ति’ का बड़ा खेल! नियमों को रौंदकर प्रधान पाठकों को बना दिया हॉस्टल अधीक्षक, दोहरी ड्यूटी और विभागीय मनमानी पूरी तरह बेनकाब”

NOC में ‘प्रतिनियुक्ति’ का बड़ा खेल! नियमों को रौंदकर प्रधान पाठकों को बना दिया हॉस्टल अधीक्षक, दोहरी ड्यूटी और विभागीय मनमानी पूरी तरह बेनकाब”

 

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NOC पर ही उठे गंभीर सवाल, राज्य शासन के अधिकार पर जिला स्तर का अतिक्रमण; 20–30 किमी दूर से दोहरी जिम्मेदारी और आदेशों में विरोधाभास से बढ़ा विवाद

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।जिले के शिक्षा विभाग में सामने आया एक मामला अब पूरे प्रशासनिक सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर रहा है। एक शासकीय स्कूल के प्रधान पाठक को छात्रावास अधीक्षक के पद पर पदस्थ कर दिया गया, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जिस तरह नियमों की अनदेखी, आदेशों का टकराव और कागजी प्रक्रियाओं का संदिग्ध इस्तेमाल सामने आया है, उसने इस नियुक्ति को विवादों के केंद्र में ला दिया है।

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सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जारी किए गए अनापत्ति प्रमाण पत्र, यानी NOC, में ही संबंधित शिक्षक को आदिवासी विकास विभाग में “प्रतिनियुक्ति” पर भेजे जाने का उल्लेख कर दिया गया है।

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जबकि प्रशासनिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह कहता है कि प्रतिनियुक्ति का अधिकार केवल राज्य शासन स्तर पर होता है, न कि जिला या किसी विभागीय अधिकारी के पास। ऐसे में एक साधारण NOC के जरिए प्रतिनियुक्ति जैसा गंभीर प्रशासनिक निर्णय दिखाना न सिर्फ नियमों की अवहेलना है, बल्कि पूरे आदेश की वैधता पर सवाल खड़ा करता है। यह केवल शब्दों की गलती मान लेना आसान होगा, लेकिन जिस तरह से इसे लागू किया गया है, वह इसे एक सुनियोजित “जुगाड़” की शक्ल देता नजर आता है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि आखिर यह नियुक्ति NOC के आधार पर हुई भी है या नहीं। यदि हुई है, तो क्या NOC के माध्यम से प्रतिनियुक्ति संभव है, जबकि नियम इसकी अनुमति नहीं देते। और यदि बिना वैध NOC या बिना विभागीय NOC के ही पदस्थापना कर दी गई, तो यह मामला और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि यह सीधे-सीधे नियमों को दरकिनार कर की गई कार्रवाई मानी जाएगी। दस्तावेजों में दिख रहे विरोधाभास इस पूरे मामले को और संदिग्ध बना रहे हैं, जहां एक तरफ प्रतिनियुक्ति का उल्लेख है, वहीं दूसरी ओर राज्य शासन का कोई स्पष्ट आदेश सामने नहीं है।

मामले का दूसरा अहम पहलू यह है कि जिस प्रधान पाठक को यह अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है, उसकी मूल पदस्थापना और छात्रावास के बीच 20 से 30 किलोमीटर की दूरी बताई जा रही है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि एक व्यक्ति दोनों स्थानों पर प्रभावी रूप से अपनी जिम्मेदारी कैसे निभा पाएगा। स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि संबंधित प्रभारी न तो नियमित रूप से स्कूल में उपस्थित हो पा रहे हैं और न ही छात्रावास की सही देखरेख हो रही है। इसका सीधा असर दोनों व्यवस्थाओं पर पड़ रहा है, जिससे स्कूल की पढ़ाई और छात्रावास की व्यवस्था दोनों प्रभावित हो रही हैं।

जबकि शासन की मंशा है की कम से कम 5 से 8 किमी मीटर दूरी तक सीमित है जो स्कूल और हॉस्टल का देख रेख अच्छा कर सके …!

इस पूरे मामले को और उलझाने वाला पहलू विभागीय आदेशों का विरोधाभास है। एक ही विभाग द्वारा एक ही विषय पर अलग-अलग तरह के निर्देश जारी किए गए हैं, जहां कुछ आदेशों में दो कालखंड के बाद अधीक्षक कार्य करने की बात कही गई है, वहीं अन्य आदेशों में मूल कर्तव्यों के साथ ही अधीक्षक की जिम्मेदारी निभाने का निर्देश दिया गया है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक असमंजस को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि या तो विभाग के भीतर समन्वय की भारी कमी है या फिर जानबूझकर नियमों को लचीला बनाकर मनमानी की जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। किसी भी स्कूल में प्रधान पाठक की भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि शैक्षणिक नेतृत्व की होती है। ऐसे में उनकी अनुपस्थिति या व्यस्तता से स्कूल की गुणवत्ता, अनुशासन और निगरानी सभी प्रभावित होते हैं। वहीं छात्रावास में भी उचित निगरानी का अभाव बच्चों की सुरक्षा और दैनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। यानी एक ही फैसले ने दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं को कमजोर कर दिया है।

इतनी गंभीर अनियमितताओं के बावजूद आदिवासी विकास विभाग या शिक्षा विभाग की चुप्पी इस पूरे मामले को और संदेहास्पद बना रही है। यह समझ से परे है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। स्थानीय लोगों, अभिभावकों और शिक्षा से जुड़े संगठनों ने इस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह महज लापरवाही है या फिर किसी प्रकार की “सेटिंग” के तहत लिया गया फैसला।

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही का यह मामला अब केवल एक नियुक्ति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों के पालन की वास्तविक स्थिति को उजागर कर रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इस ‘NOC में प्रतिनियुक्ति’ के खेल की जांच होगी, क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी, या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह धीरे-धीरे फाइलों में दबकर रह जाएगा। फिलहाल, शिक्षा विभाग या आदिवासी विकास सवालिया निशान खड़ा है और जवाब देने वाला कोई नजर नहीं आ रहा..?

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